भक्त शिरोमणि कविकुल चूणामणि

गोस्वामी तुलसीदास जी

तुलसी तुलसी सब कहे,
तुलसी बन की घास |

हो गयी कृपा राम की,
तो बन गए तुलसीदास ||

तुलसी मीठे बचन
ते सुख उपजत चहुँ ओर |

बसीकरन इक मंत्र है
परिहरू बचन कठोर ।।

दया धर्म का मूल है
पाप मूल अभिमान |

तुलसी दया न छांड़िए ,
जब लग घट में प्राण ||

राम नाम मनिदीप
धरु जीह देहरीं द्वार |

तुलसी भीतर बाहेरहुँ
जौं चाहसि उजिआर ||

भक्त शिरोमणि कविकुल चूणामणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अन्य सन्तों की की भॉंति अपने जीवन के विषय में कुछ भी नहीं लिखा फिर भी उनकी रचनाओं में कहीं-कहीं कुछ ऐसे प्रसंग मिल जाते हैं जो उनके जीवनकाल में उनके साथ घटी घटनाओं पर प्रकाश डालते हैं उनके इष्टदेव अतिशिव प्रिय जानकी वल्लभ श्रीराम थे।

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भक्त शिरोमणि कविकुल चूणामणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अन्य सन्तों की भॉंति अपने जीवन के विषय में कुछ भी नहीं लिखा फिर भी उनकी रचनाओं में कहीं-कहीं कुछ ऐसे प्रसंग मिल जाते हैं जो उनके जीवनकाल में उनके साथ घटी घटनाओं पर प्रकाश डालते हैं उनके इष्टटेव अतिशिव प्रिय जानकी वल्लभ श्रीराम थे।
अतः उन्होंने श्री रामचरितमानस में उनका विस्तृत जीवन चरित्र लिखा किन्तु स्वयं के विषय में कोई चर्चा ही नहीं की। यहॉं तक कि अपने कुल-गोत्र, जन्मतिथि, माता-पिता का नाम और जन्म स्थान के नाम तक का कहीं भी उल्लेख नहीं किया पूछने पर झुंझलाकर कह दिया- तुलसी सरनाम गुलाम है राम को जा को रुचै सो, कहे कछु ओउ। अति ही अयाने उपखानो नहिं बूझौ लोग, साह ही को गोत है गुलाम को, साधु कै असाधु कै भलौ कै पोच सोच कहा, का कारछू के द्वार परौ हों सो हौं राम का। तुलसीदास जी के जन्म के विषय में यह दोहा प्रचलित है-

पन्द्रह सै चौ‍वन वर्ष तरनि तनूजा तीर। श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धरचोर शरीर। यह है पन्द्रह सौ चौवन विषै, कालिन्दी के तीर श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धरे शरीर।।

तुलसीदास की रचनाओं में काशी का उल्लेख बार-बार किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि काशी का तुलसीदास के हृदय के इस प्रकार निकट हो। उनकी अनूठी समन्वयवादी चेतना का प्रभाव है। तुलसीदास के अनुसार सद्गति का उपाय काशी में रहकर राम का जप करना ही हैं, काशी में उनका अधिकांश जीवन सुख समृदि में बीता। उनकी रचनाओं से पता चलता है कि काशी से उनका स्वाभाविक प्रेम था वे कहते हैं- मुक्तिजन्म महि जानी, ज्ञान खानि अघ हानिकर। जहॅं बस संभु भवानि, सो काशी सेइय कस न।। तुलसीदास जी का सर्वाधिक समय अस्सी घाट पर बीता जो अब तुलसीघाट कहा जाता है यहीं तुलसी मंदिर तथा तुलसीदासजी का अखाड़ा है जिसमें गोस्वामी जी रहते थे। यहीं उनका देहावासन भी हुआ। इस सम्बन्ध में उल्लेख अनेक स्थलों पर प्राप्त होता है संवत़ सोलह सौ अस्‍सी, असीगंग के तीर। श्रावण कृष्णा तीज शनि तुलसी तज्यो शरीर। उनका बचपन बहुत ही कष्टमय व्यतीत हुआ। भिक्षाटन तक करना पड़ा, दर-दर भटकना पड़ा। उनकी शादी रत्नावली नाम की कन्या से हुई थी।

रचनाएँ


रामचरितमानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, श्रीकृष्ण गीतावली, पार्वती मंगल रामाज्ञा प्रश्न, हनुमान बाहुक, हनुमान चालीसा, रामलला नहकू, जानकी मंगल वैराग्य संदीपनी। उनके ग्रंथों की कुछ पाण्डुलिपियॉ अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास, तुलसीघाट में सुरक्षित हैं।

गोस्वामी तुलसीदास: भक्ति आन्दोलन


उत्तर भारत में रामभक्ति का प्रचार करने वाले प्रमुख गोस्वामी तुलसीदास थे। तुलसीदास कबीर की भाँति प्रबल सुधारक नहीं थे और न ऐसा ही लगता है कि उन्होने किसी सम्प्रदाय की स्थापना की या किसी विशेष वेदान्त सिद्धान्त का प्रचार किया वे भक्तिमार्ग के आचार्य थे, उनके भक्तिमार्ग के तीन प्रमुख उद्देश्य थे-
  • 1. प्राचीन हिन्दू सामाजिक व्यवस्था की रक्षा करना,
  • 2- शूद्रों को अधिकार देने के साथ-साथ इस्लाम धर्म स्वीकार करने से रोकना,
  • 3- भक्तिमार्ग के माध्यम से मोक्ष का सरल साधन उपलब्ध कराना। उनकी भक्तिमार्ग द्वैत परक है, किन्तु दार्शनिक दृष्टि से उसका झुकाव अद्वैत की ओर है' रामचरित मानस' और 'विनय पत्रिका' शताब्दियों से उत्तर भारत के लोकजीवन के मुख्य आध्यात्मिक संबल रहे हैं साक्षर-निरक्षर, धनी-निर्धन, नागर, गंवार आदि समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा उनकी कृतियॉं वेदों की भाँति पूजी जाती रही है। दुःख में उनकी पंक्तियों का सहारा लेकर वे हृदय का भार हल्का करते हैं और सुख में दुहराकर द्विगुणित उत्साह के साथ कार्यक्षेत्र में उतरने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। तुलसी व राम के उद्भुत लोकाकर्षण का रहस्य क्या है?
    हमारी समझ में इन सारी सफलता के मूल में गोस्वामीजी की लोकजीव के प्रति गहरी संवेदना और उनका प्रगाढ़ लोकानुभव है। उनके जीवन का अधिकांश समय अकबर के शासनकाल में बीता। सन् 1605 में अकबर के दिवंगत होने पर वे 18 वर्ष तक जहॉंगीर की हुकूमत में भी जीवित रहे इस प्रकार मुगल सत्ता के उत्कृष्टता की राज्यवयवस्‍था का उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने का सुयोग मिला था। मुगल सम्राटों का शासन शैन्यबल पर आधारित था। सम्राट् की आज्ञा ही कानून होती थी। प्रजा को अकारण दण्ड देकर आतंकित रखना उनकी नीति का मुख्य उद्देश्य होता था। अपनी सत्ता को दृढ़ करने के लिये परम्परागत राजवंशों को पदच्युत करके उनके स्थान पर संस्कार तथा व्यक्तित्वहीन राजे नियुक्त कर रखे थे।
    ''काल तोपची तुपच महि, दारु अनय कराल। पाप पलीता कठिन गुरु गोला पुहुमीपाल। (दोहावली)।''
    हिंसा के साथ छल और प्रवंचन का आश्रय लेकर मुगल शासन कभी हिन्दू राजाओं को आपस में ही लड़ा कर और कभी कपटपूर्ण मेल-व्यवहार करके उन्हें आत्मसात कर लेता था।


शासकों का आन्तरिक जीवन वैभव एवं विलासपूर्ण था। सुरा-सुन्दरी के रंग में खर्राटे भरते हुए उन्हें प्रजा हित की चिन्ता नहीं थी। इससे आए दिन दुर्जन पुरस्कृत और सज्जन दण्डित होते रहते थे। रामचरितमानस, छन्द 139। इस प्रकार हिन्दुओं को सभी सम्भव उपायों से प्रताडि़त करके उन्हें दास के रूप में रखना चाहते थे। इस स्वप्न को सार्थक बनाने में ही उनकी सारी शक्ति लगी रहती थी, निरंकुश राजतंत्र अपनी ऐहिक वासनाओं की पूर्ति तथा हिंसात्मक नीति को कार्यान्वित करने के लिये अनेक अवांछनीय उपायों से धन एकत्र करता था। कवितावली 7/179। नीचे दारिद्रय, और मुगलों का क्रूर शासन, यही चक्की के दो पाट थे, जिनके भीतर पड़े हुए असंख्य मानव कंकाड नृशंसतापूर्वक पिसे जा रहे थे। उनका अति क्रन्दन लोककवि गोस्वामीतुलसीदास की वाणी में कैसे मुखरित न होता।

कृष्णभक्तों का मुख्य लक्ष्य राधाकृष्ण का प्रेम-विलास तथा माधुर्य वर्णन था, जो एकांगी होने के कारण लौकिक जीवन एवं समाज के विस्तृत तथा सर्वांगीण उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकता था। उनकी प्रेम-प्रधान वृत्ति तत्कालीन समाज में नैतिकता तथा उत्साह प्रदान करने में पूर्ण समर्थ नहीं हो सकती थी। सगुणधारा की भारतीय पद्धति के भक्तों में कबीर, दादू आदि के लोकधर्म विरोधी स्वरूप यदि किसी ने पहचाना तो वह गोस्वामी तुलसीदास जी थे। उन्होंने देखा कि उनके वचनों से जनता की चित्तवृत्ति में ऐसे घोर विकास की आशंका है जिससे समाज विशृङ्खल हो जायेगा और उनकी मर्यादा नष्ट हो जायेगी।''
इसीलिये तुलसीदास ने एक कुशल नेता के समान सभी परिस्थितियों का निरीक्षण किया और एक ऐसे आदर्श लौकिक जीवन का चित्र जनता के सम्मुख प्रस्तुत किया जिससे मृतप्रायः जाति के प्राणों में एक स्फूर्ति का संचार हो सके। तुलसी ने राम भक्ति के आधार पर जीवन के व्यापक क्षेत्रों में जागृति उत्पन्न की। वे तत्कालीन जाति की पतवार सम्भालने वाले कुशल नाविक थे जो शासन के कारण उत्पन्न हुई प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रवाह में भी जाति की नैया को बचाते हुए किनारे तक लाने में सफल हुए। वे युग प्रवर्तक थे भक्त शिरोमणि थे, राजनीति विशारद थे।
तुलसीदास ने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का विश्लेषण, रावण के राज्य में होने वाले अन्याय एवं अनीति के वर्णन के बहाने उन्होंने तत्कालीन शासकों की घोर निन्दा की है। कुशासन से पीडि़त जनता की दुरवयवस्था का चित्र अच्छी तरह खींचा है। समकालीन लोक जीवन तथा स्वभाव के अध्ययन में तुलसीदास की जीवनयात्रा की प्रारम्भिक परिस्थितियाँ बहुत सहायक हुई। बाल्यावस्था से ही आश्रयहीन हो जाने के कारण दर-दर की ठोकर खाते हुए उन्हें समाज को अत्यन्त निकट से देखने का अवसर प्राप्त हुआ था। कवितावली 7/73।
तत्कालीन समाज का चित्रण करने में गोस्वामी जी धन्य हैं। उन्होंने ऐसे समय में अपनी बुद्धि और लेखनी के बल से अत्याचारियों का दर्प चूर्ण और मान-मर्दन कर स्वदेशियों को सच्चे धर्म-मार्ग में अटल रखने का दृढ़ निश्चय किया, जिस समय अत्याचारियों का खड्ग चतुर्दिक चमाचम-चमकता हुआ सर्वदा हिन्दुओं का कलेजा कॅंपाया करता था। तत्कालीन धार्मिक अवस्था का कहॉं तक वर्णन किया जाए।
सारी जाति वेद विरुद् मार्गों को अपनाने में लीन हो रही थी- ''गोरख जगायो जोग, भक्ति भगयो लोग।'' नये-नये सम्प्रदायों के प्रचलित होने के कारण सच्चे आर्य धर्म को जनता भूल चुकी थी और भक्ति एवं धर्म के नाम वाद-विवाद बढ़ रहे थे। तुलसीदास स्वयं इस वाद-विवाद से दुखी थे। ऐसी विषम धार्मिक परिस्थितियों में जबकि भारतीय संस्कृति संकट में पड़ी थी- तुलसीदास ने रामभक्ति का सन्देश लेकर छिन्न-भिन्न हुए समाज को संगठित तथा सुव्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण कार्य किया।
सोलहवीं सदी के भक्ति आन्दोलन के परिणामस्वरूप निर्गुण सम्प्रदाय में परिगणित तथा पिछड़ी जातियों के सन्तों का प्राधान्य हो चला था। सगुणमार्गी साधुओं की दशा और भी शोचनीय थी। उनमें वैराग्य वृत्ति का क्रमशः, ह्रास होता जा रहा था। सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों में व्याप्त दुरव्‍यवस्‍था को देखकर तुलसीदास ऐसा साहसी तल ज्ञानी भी किंकत्र्तव्यविमढ़ हो गया था। (कासो कीजे रोष दोष दीजौ कहि। पाहि राम कियो कलिकाल सब खलक खकल कही, कवितावली 7/98।) तुलसीदास का धर्म वहीं हो जो मानव को पाप पर पुण्य को विजय करना सिखाए, जो भावनाओं का निषेघ कर कर्तव्य पर आरुढ़ होने का सन्देश दे, तुलसीदास के राम इसी प्रकार के आचरण करने वाले धर्म के प्रतीक थे। तुलसीदास ने राम का व्यावहारिक रुप प्रस्तुत कर नर में नारायण की कल्पना द्वारा आड़े समय में भारतीय जनता को मार्ग दिखाया। मुगलों के शासन में सारा वातावरण अशान्त था भारतीय जनता में हीन भावना बढ़ने लगी थी।
इसके साथ-साथ अपने भुजबल का सहारा टूट चुका था ऐसी परिस्थिति में तुलसीदास कर ही क्या कर सकते थे? उन्होंने भक्ति का सहारा लिया। वे अनुभव करते थे कि भारतीयों का चिरनकाल से यह विश्वास चला आ रहा है कि भगवान् की शरण ही सब बाधाओं को दूर कर सकती है। तुलसीदास की भक्ति ने राम राज्य की वास्तविकता से परिचित कराया। लौकिक कर्तव्‍यों का पालन करते हुए प्राचीन आचारों को निभाते हुए राम, सीता, हनुमान, भरत और लक्ष्मण की ओजस्वी मूर्तियां हदय में स्थापित कर जनता सहे, उठे और आगे बढ़े- यह सन्देश तो तुलसीदास ने दिया।
तुलसीदास का धार्मिक सन्देश मध्यकालीन भारत के डगमगाते हुए राष्ट्र के लिये कितना वरदान सिद्ध हुआ। उन्होंने अपने काव्य के द्वारा देश की रक्षा के लिये अपूर्व मार्ग प्रदर्शन की चेष्टा की। दिल्ली सल्तनत के स्थापना काल से ही यवन शासन-व्यवव्स्था का मुख्य उद्देश्य इस्लामी संस्कृति तथा धर्म का प्रचार था। तीन सौ वर्ष के इस विधर्मी शासन के अत्याचारों से पिसते हुए हिन्दुओं के धार्मिक आचार-विचार लुप्त हो गये थे। जब वेद-पुराण का कथन-श्रवण ही दण्डनीय अपराध हो-ऐसे युग में धार्मिकता का तिरोहित हो जाना कोई आश्चर्य नहीं था।
इस काल में व्यक्तिगत रुप से इतना चारित्रिक पतन हो गया था कि ब्राह्मण ज्ञान बघारने वाले ढोंगी कौड़ी के लिए गुरु तथा ब्राह्मणों की हत्या करने में नहीं हिचकते थे। रामचरितमानस 7/99क। अपने समकालीन वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में व्याप्त इस अन्धकार से मुक्ति पाने का एकमात्र साधन तुलसीदास की दृष्टि में मर्यादा पुरुषोत्तम राम सर्वतोभावने शारणागति थी। उन्हीं का लोकपावन चरित्र मानव जीवन के इस सभी पक्षों का अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत कर निराशहीन भावग्रस्त और किंकर्तव्यविमूढ़ जनमानस में आशा तथा उत्साह का संचार कर सकता था। इस प्रकार आत्मिक विकास के साथ ही सामाजिक उत्थान तथा राजनीतिक परिवर्तन संगठित करने में प्रेरणाप्रद सिद्ध हो सकता था। कहने को तो जहॉंगीर किन्तु वास्तव में नूरजहॉं के शासन में अपने अन्तिम दिन व्यतीत करने वाले इस महाप्राण सन्त ने उसी निष्ठा के आधार पर मुगल साम्राज्ञी की उपेक्षा कर एक मात्र सीता को ही 'साहिबिना'' माना। उनके दोहावली छन्द- मेरी ''साहिबिनी सदा सीस पर विलसत।'' छन्द से स्पष्ट हो जाता है कि वे दृढ़म थे। उन्होंने रामभक्ति के ऐसे स्वरूप की प्रतिष्ठा की जिसमें लोकमानस को अन्ध विश्वास, हीनभाव तथा रुढि़वाद से युक्त करने का सामर्थ था। जन सामान्य में रामभक्ति का प्रचार करने के लिये उन्होंने रामलीला लोकरंजन पद्धति का आश्रय लिया और स्थान-स्थान पर हनुमान मन्दिरों की स्थापना की रामोपासना में हनुमान तत्तव को प्रमुखता देकर उन्होंने अध्यात्म साधना के साथ बालोपासना का मार्ग प्रशस्त किया और जनमानस में यह भावना कूट-कूटकर भर दी कि सभी प्रकार की आपत्तियों से त्राण संकटमोचन केसरीनन्दन ही दिला सकते हैं (कवितावली- हुनमान बाहुक, छन्द-10)।
लोकमानस सूक्ष्मतम प्रवृत्तियों के गहन अध्ययन और लोकजीवन की अन्तर्धाराओं के प्रगाढ़ परिचय के आधार पर ही उन्होंने रामकथा और भक्ति की परम्परा को नया रुप दिया। उन्होंने जनता के भीतर से ही क्रान्ति को माध्यम बनाया। भगवान् बुद्ध की भांति उन्होंने जन-सामान्य को लौकिक तथा आध्यात्मिकता के अतिरेक से बचाकर मध्यममार्गी आचार पद्धति अपनाने का उपदेश दिया और राम के चरित्र में उस आदर्श की पराकाष्ठा दिखाकर उनकी भक्ति में ही मानव जीवन की सार्थकता प्रतिपादित की। समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त उच्च वर्ग के धनी-मानी व्यक्तियों को शोषक और विषाक्त प्रवृत्तियों के प्रसारक तथा अभावग्रस्त और परिश्रमशील किसानों, मजदूरों को लोकपोषक एवं लोकहित साधक बताकर उन्होंने जिस अपार संवेदनशील हृदय और अन्तर्भेदिनी दृष्टि का परिचय दिया, वह आज की समाजवादी व्यवस्था का मूलाधार कहा जा सकता है। अपने भक्तिपरक उपदेशों द्वारा जनता के ह्रदय पर प्रभावी अधिकार रखनेवालों में रामभक्ति-शाखा में तुलसीदास हैं जिनके भक्तिपरक उपदेशों में भक्ति आन्दोलन को अधिक बल मिला। इसलिये यह निर्भीक भाव से मानना पड़ता है कि सोलहवीं शताब्दी के भक्ति आन्दोलन को बढ़ाने में गोस्वामी तुलसीदास का बहुत बड़ा योगदान रहा।


रचनाएँ

रामचरितमानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, श्रीकृष्ण गीतावली, पार्वती मंगल रामाज्ञा प्रश्न, हनुमान बाहुक, हनुमान चालीसा, रामलला नहकू, जानकी मंगल वैराग्य संदीपनी। उनके ग्रंथों की कुछ पाण्डुलिपियॉं अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास, तुलसीघाट में सुरक्षित हैं।

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सदेंश भेंजे

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